बोल की लब आज़ाद है तेरे
आज समूची दुनिया औरतो के हक़ और उनके अधिकारों को लेकर बात कर रही है खासकर अगर हम भारतीय की बात करे तो राजनीती के बहाने यहाँ औरतो को लेकर उनके अधिकारों को लेकर खूब बाते होती है उनकी सामाजिक स्थिति पर खूब सवाल उठाये जाते है लेकिन ये सब लिखने ,सुनने और बोलने वाले लोग क्या वास्तव में उनके हक़ के पैरोकार है। मैं मानती हूँ नहीं. भले ही फेमनिस्ट कही जाने वाली आबादी तथाकथित शोषित महिलाओ की पैरोकार बनती दिखाई देती हो लेकिन सच इसके उलट है एक आंकड़े के मुताबिक सबसे ज्यादा शोषण करने वाले लोग घर के भीतर मौजूद है. जबतक इसे लेकर पब्लिक फोरम पर बात न की जाये बात नहीं बनेगी. घर में और बाहर उन्हें निर्णय लेने में अधिकार देकर हम स्त्रियों के लिए एक नई दुनिया का दरवाज़ा खोल सकते है. मैं इस बात की पैरोकार हूँ की महिलाओ को सेक्सुअल आज़ादी मिलनी चाहिए. उनके लिए वो सारे दरवाज़े खोल दिए जाने चाहिए जिनके बहाने आज तक उन्हें शोषित किया गया है इसे नैतिकता से जोड़कर कदापि नहीं देखना चाहिए और न ही स्त्रियोचित व्यवहार रूप में जगह देनी चाहिए. शुरुआत यही से होनी चाहिए, विगुल यही से फुकना चाहिए और शोर भी यही से होना चाहिए पुरुषो की नैतिकता वाले किले में सेंध लगानी है तो विद्रोह तो करना होगा. कुछ नया और क्रन्तिकारी तो रचना होगा। नैतिकता के सारे तय पैमाने ध्वस्त करने होंगे तभी हमारी जगह पक्की होगी वरना वही पैरो में दासी वाली स्तिथि बानी रहेगी. इसलिए शोर करो खुद जागो और दुसरो को भी जगाओ.

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